रूण फखरुद्दीन खोखर
ग्वालू भागवत कथा में पौधाम मंहत रामनिवास महाराज और भादवासी के त्यागी संत हेतमराज महाराज भी पधारे
रूण-निकटवर्ती गाँव ग्वालु मे चल रही श्रीमद्भागवत कथा के षष्टं दिवस पर पौ धाम के महन्त रामनिवास महाराज व भादवासी के संत हेतमराम महाराज व संत नेमीराम महाराज भी पहुंचे, इस मौके पर कथावाचक आचार्य हुकमाराम शास्त्री ने कहा कि जिनके घरों व कथा मे सन्तो का का पधारणा होता हे उनका जीवन सफल हो जाता हे।

बड़ भाग मानुष तन पावा,जिनका बहुत जन्म का भाग्य उदय होता हैं,उनके घर संतो का आगमन होता है। इस मौके पर
सन्त रामनिवास महाराज ने कहा दान व पुण्य करने हैं मानव जीवन आनन्द मय हो जाता है।
प्रत्येक व्यक्ति को दया धर्म पर चलना चाहिए, इसीलिए हमारी कमाई को पवित्र करने के लिए दान पुण्य जरूरी है।
वही भादवासी के संत हेतमराम महाराज ने कहा व्यक्ति को धर्म का मार्ग अपनाना चाहिए हमें अधिक से अधिक धार्मिक आयोजन करके ईश्वर को प्राप्त करने और पुण्य प्राप्त करने की लालसा होनी चाहिए, इसीलिए अधिक से अधिक कथा होनी चाहिए। कथा के द्वारा मनुष्य जीवन परिवर्तन होता हैं,ज्ञान व विवेक की प्राप्ती होती है,
सन्तो की कृपा से नारदजी महान ऋषि बने व ब्रह्मा के मानस पुत्र हुवे।

भाग भला जिन घर संत पधारे।
आप तीरे प्रभू ओराने तारे।।
वही कथामे-आचार्य ने कृष्ण की बाल लीला का विस्तार से वर्णन किया।
पुतना बकासुर व अनेक राक्षसो का वध किया। इस मौके पर आचार्य ने कई दृष्टांत विस्तार से बताए और संगीतमय स्वर लहरियों के साथ श्रद्धालु झूम उठे।
*आज निर्जला एकादशी पर आचार्य की ओर से विशेष लेख*
जो श्रद्धालु साल के सभी 24 एकादशी का व्रत करने में सक्षम नहीं हैं, वे निर्जला एकादशी का व्रत करके सभी एकादशियों के व्रत का पुण्य प्राप्त कर सकते हैं। हर साल 24 एकादशी होती है, लेकिन जिस साल पुरुषोत्तम मास यानी मलमास पड़ता है, उस साल संख्या 26 हो जाती है। मान्यता है कि गर्मी के मौसम में काम आनेवाली वस्तुएं जैसे वस्त्र, जूता, छाता, फल आदि दान करने के साथ ही पूरे दिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करना चाहिए। ज्यादातर लोग इस दिन शरबत आदि पेयजल बांटते नजर आते हैं, क्योंकि इस दिन जल से भरे कलश का दान अनिवार्य माना जाता है
निर्जला एकादशी व्रत पर दान-पुण्य और गंगा स्नान का विशेष महत्व बताया गया है। जो लोग शहर में हैं और गंगा स्नान करने नहीं जा सकते हैं, वे स्नान के पानी में गंगा जल की कुछ बूंदें मिलाकर स्नान कर सकते हैं। निर्जला एकादशी के व्रत में जल तक ग्रहण नहीं किया जाता है। मान्यता है, जो भी भक्त सच्चे मन से इस एकादशी का व्रत करता है, उसे बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है। सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। शास्त्रों के अनुसार, इस एकादशी कथा को पढ़ने और सुनने से सहस्र गोदान के जितना पुण्य फल प्राप्त होता है।
नारदपुराण के अनुसार, एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को बेहद प्रिय होता है। इस दिन सुबह स्नानादि से निवृत होकर भगवान विष्णु का ध्यान करें और इसके बाद व्रत का संकल्प लें। पूजा घर में भगवान विष्णु की तस्वीर पर गंगाजल के छींटे दें और रोली-अक्षत से तिलक करें और इसके बाद व्रत का संकल्प लें। देसी घी का दीपक जलाकर भगवान से जाने-अनजाने जो भी पाप हुए हैं, उससे मुक्ति पाने के लिए प्रार्थना करें और उनकी आरती भी उतारें। इसके बाद द्वादशी तिथि को स्नान करने के बाद भगवान को व्रत पूरा होने पर स्मरण करें। इसके बाद ब्राह्मण को भोजन करवाकर दक्षिणा सहित विदा करें।
जब सर्वज्ञ वेदव्यास ने पांडवों को चारों पुरुषार्थ- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देने वाले एकादशी व्रत का संकल्प कराया तो महाबली भीम ने निवेदन किया- पितामह! आपने तो प्रति पक्ष एक दिन के उपवास की बात कही है। मैं तो एक दिन क्या एक समय भी भोजन के बगैर नहीं रह सकता- मेरे पेट में ‘वृक’ नाम की जो अग्नि है, उसे शांत रखने के लिए मुझे कई लोगों के बराबर और कई बार भोजन करना पड़ता है। तो क्या अपनी उस भूख के कारण मैं एकादशी जैसे पुण्यव्रत से वंचित रह जाऊँगा?
पितामह ने भीम की समस्या का निदान करते और उनका मनोबल बढ़ाते हुए कहा- नहीं कुंतीनंदन, धर्म की यही तो विशेषता है कि वह सबको धारण ही नहीं करता, सबके योग्य साधन व्रत-नियमों की बड़ी सहज और लचीली व्यवस्था भी उपलब्ध करवाता है। अतः आप ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की निर्जला नाम की एक ही एकादशी का व्रत करो और तुम्हें वर्ष की समस्त एकादशियों का फल प्राप्त होगा। निःसंदेह तुम इस लोक में सुख, यश और प्राप्तव्य प्राप्त कर मोक्ष लाभ प्राप्त करोगे।
इतने आश्वासन पर तो वृकोदर भीमसेन भी इस एकादशी का विधिवत व्रत करने को सहमत हो गए। इसलिए वर्ष भर की एकादशियों का पुण्य लाभ देने वाली हैं,यह व्रत को नर नारी दोनो को करना चाहिए। इस दिन निर्जल व्रत करते हुए शेषशायी रूप मे भगवान विष्णु की अराधना का विशेष महत्व है। इस दिन ॐ नमो भगवते वासुदेवाय का जप करके गोदान, वस्त्र दान, छत्र, फल आदि का दान करना चाहीए।