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शरद पूर्णिमा का पर्व बडे धुमधाम से मनाया         

पादूकलां।(दीपेंद्र सिंह राठौड़)      कस्बें सहित आस पास के ग्रामीण आंचल में शरद पूर्णिमा के पर्व पर मन्दिरों में सुबह से भक्तों की भीड़ लगजाती है। इस दिन भगवान के खीर का भोग लगता है। भारतीय संस्कृतियों में कई देवी देवता हैं जिनकी हम पूजा बहुत ही श्रद्धा भाव करते हैं शरद ऋतु की शुरुआत आते ही इंतजार होता है

शरद पूर्णिमा की रात के उस पहर का जिसमें 16 कलाओं से युक्त चंद्रमा अमृत की वर्षा पृथ्वी पर करता है व्रत के साथ साथ बहुत कुछ बदल गया है लेकिन इस पर्व का इंतज़ार आज भी उसी तरह होता है जैसे पहले होता था। दिन हिन्दू धर्म में कई लोग अपने घर के आँगन और छत  पर किसी बर्तन में खीर बना के उसे ऊपर रखते हैं ताकि रात में गिरने वाले अमृत को चख सके वैसे इससे जुड़ी बहुत सी पौराणिक मान्यताएं और कथाए हैं।

जिनके बारे में बहुत ही कम जानते होगें शरद पूर्णिमा का महत्व शास्त्रों में भी लिखा गया है इस रात्रि को चंद्रमा अपनी समस्त कलाओं के साथ होता है और धरती पर अमृत वर्षा करता है रात 12 बजे होने वाली इस अमृत वर्षा का लाभ मानव को मिले इसी उद्देश्य से चंद्रोदय के वक्त गगन तले खीर या दूध रखा जाता है जिसका सेवन रात 12 बजे बाद किया जाता है कहा तो यहाँ तक जाता है कि खीर को खा कर रोगी रोग मुक्त हो जाता हैण्  इसके अलावा खीर देवताओं का प्रिय भोजन भी माना जाता है कई परिवारों में शरद पूनम के दिन एक और जहां चंद्रमा की पूजा कर दूध का भोग लगाते हैं वहीं अनंत चतुर्दशी के दिन स्थापित गुलाबाई का विसर्जन भी किया जाता है। इस दिन परिवार के सबसे बड़े बश्चे की आरती उतारकर उसे उपहार भी दिया जाता है।शरद पूर्णिमा पर घर में कन्याओं को आमंत्रित कर गुलाबाई के गीत गाए जाते हैं।शरद पूर्णिमा पर चांद अपनी पूर्ण कलाएं लिए होता है। मान्यता है कि इस दिन केसर युक्त दूध या खीर चांदनी रोशनी में रखने से उसमें अमृत गिर जाता है।

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