तेजाराम लाडणवा


राजस्थान की ऐतिहासिक धरती मेड़ता, जिसे पूरी दुनिया मीरा बाई की प्रेम दीवानी नगरी के नाम से जानती है, आज फिर से सुर्खियों में है विज्ञान की दुनिया में क्रांति लाने वाला एक युवा। जिस तरह मीरा ने अपने प्रेम और भक्ति से विश्व को मंत्रमुग्ध किया, वैसे ही मेड़ता के एक गरीब परिवार के बेटे, डॉ. रविंद्र कुमार प्रजापति (सारडीवाल )ने अपने जुनून और मेहनत से विज्ञान के क्षेत्र में कमाल कर दिखाया है।
गरीब परिवार से अमेरिका तक का सफर
डॉ. रविंद्र कुमार प्रजापति (सारडीवाल) का बचपन मेड़ता के प्रजापतियों का मोहल्ला देवरानी रोड की तंग गलियों में बीता। सीमित साधनों और आर्थिक तंगी के बावजूद, उनके सपनों की ऊँचाई कभी कम नहीं हुई। सरकारी स्कूल में पढ़ाई करते हुए उन्होंने विज्ञान में गहरी रुचि दिखाई। परिवार की जिम्मेदारियों के बीच, उन्होंने पढ़ाई में कभी समझौता नहीं किया। उनकी मेहनत रंग लाई—स्कॉलरशिप मिली और वे रिसर्च के लिए अमेरिका पहुंचे।
प्लास्टिक से विमानन ईंधन: एक अनोखी खोज
अमेरिका के इलिनोइस सस्टेनेबल टेक्नोलॉजी सेंटर में वैज्ञानिक के रूप में काम करते हुए, डॉ. रविंद्र कुमार प्रजापति (सारडीवाल) ने पॉलीस्टाइनिन प्लास्टिक कचरे से एथिलबेंजीन नामक यौगिक तैयार किया। यह यौगिक विमानन ईंधन (SAF) की गुणवत्ता और सुरक्षा को बढ़ाता है। इस खोज से दो बड़ी वैश्विक समस्याओं—प्लास्टिक प्रदूषण और फॉसिल फ्यूल पर निर्भरता—का समाधान मिल सकता है। उनका कहना है, “हमने कचरे को बोझ नहीं, संसाधन माना और वहीं से ऊर्जा की खोज निकाली।”
मीरा नगरी की नई पहचान
मीरा नगरी, जो अब तक भक्ति, प्रेम और त्याग के लिए जानी जाती थी, आज विज्ञान और नवाचार की मिसाल भी बन गई है। डॉ. प्रजापति रविंद्र कुमार सारडीवाल की सफलता ने साबित कर दिया कि छोटे शहरों और गरीब परिवारों से निकले बच्चे भी दुनिया बदल सकते हैं। उनकी उपलब्धि भारत और अमेरिका जैसे देशों के लिए उम्मीद की किरण है, जहां 2030 तक स्वच्छ विमानन ईंधन के बड़े लक्ष्य तय किए गए हैं।
प्रजापति डॉ. रविंद्र सारडीवाल की कहानी हर उस युवा के लिए प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखता है। जिस तरह मीरा ने प्रेम और भक्ति से दुनिया को राह दिखाई, उसी तरह मेड़ता के इस लाल ने विज्ञान के क्षेत्र में भारत का नाम रोशन किया है।