
मेड़तासिटी 🔹तेजाराम लाडणवा
दुनिया में शायद ही कोई ऐसा मंदिर होगा, जो किसी ‘भक्त’ के नाम से पहचाना जाता हो—मेड़ता का चारभुजा नाथ मंदिर वही ऐतिहासिक स्थल है, जिसे वैश्विक पहचान प्रेम दीवानी मीराबाई के नाम से मिली। यहीं से शुरू हो रहा है सात दिवसीय मीरा जयंती महोत्सव, जो 30 जुलाई से 6 अगस्त तक भक्ति, समरसता, रंग-बिरंगी सांस्कृतिक झांकियों और अखंड हरिकर्तन का जीवंत संगम बनेगा।

महोत्सव का शुभारंभ राजपूत समाज की महिलाओं-पुरुषों की विशाल शोभायात्रा से होगा, जहां गीत-संगीत और जयकारों के साथ रजत रेवाड़ी की स्थापना होगी। इसके बाद मीरा मंदिर दुल्हन-सा सजकर, जगमग रोशनी और पुष्प-मेघ के बीच, अखंड भजन-कीर्तन सप्ताह की यादगार शुरुआत करेगा। हर समाज की अपनी-अपनी बारी: महिलाएं, पुरुष, बच्चे—सभी हिन्दु जातियों के बालक बालिकाएं महिला पुरुष नियमित रूप से भक्ति में रमे रहेंगे।

महोत्सव की खास पहचान है—छुआछूत की दीवारों को तोड़ती परम्परा: आज भी पहला भोग संत रविदास जी महाराज (जीनगर समाज) के परिवार द्वारा चढ़ाया जाता है। यही नहीं, देश-विदेश से आए भक्त, साधु-संत और जनप्रतिनिधि यहां जुटते हैं, भारत की एकता, भक्ति और सामाजिक समरसता के इतिहास को फिर से सांस लेते देखना चाहते हैं।

देवरानी सरोवर पर दीपदान—हजारों दीपों की कतार, विदेशी कलाकारों की प्रस्तुतियां—और हर शाम सुप्रसिद्ध भजन कलाकारों की भजन संध्या इस त्यौहार को नई ऊंचाई देती हैं। आखिर में 6 अगस्त को, हेवन, पूर्णाहुति और ठाकुर जी की शोभायात्रा के साथ यह भक्ति महाकुंभ अपने उत्कर्ष पर पहुंचता है।
कहते हैं, यहां आने वाला हर भक्त सिर्फ मंदिर नहीं, मीरा की प्रेम-गाथा, धार्मिक एकता और सामाजिक न्याय की अमिट मिसाल देख जाता है—क्योंकि चारभुजा नाथ का मंदिर, सच में, ‘भक्त के नाम से प्रसिद्ध विश्व का पहला मंदिर’ है!